काम, धर्म और मनुष्य का आंतरिक राजपथ
पतन और उत्कर्ष के बीच का सूक्ष्म, पर निर्णायक अंतर
Hello, my readers.
I have long meant to summarize the personal philosophy that I work with. It comes directly from the ancient Indian philosophy, and I felt I could do it justice only by articulating it in Hindi.
I would truly appreciate engaging with your comments if this article speaks to you.
भारतीय दर्शन में काम (इच्छा, वासना, आकर्षण) को कभी पाप नहीं कहा गया। यह मनुष्य के चार पुरुषार्थों में से एक है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - ये जीवन के चार स्तंभ हैं, और ये परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इसलिए काम का निषेध नहीं है; उसका नियमन है। समस्या तब जन्म लेती है जब काम धर्म से ऊपर उठकर मनुष्य का स्वामी बन जाता है। जब इच्छा साधन होती है, वह जीवन को आगे बढ़ाती है; जब वह स्वामी बनती है, वह जीवन को नीचे खींच ले जाती है।
हिंदू परंपरा ने भोग का अंधा उत्सव नहीं मनाया। उसने मनुष्य को संयम, स्वामित्व और आत्म-नियंत्रण का मार्ग दिखाया। वह जानती थी कि मनुष्य का मन स्वभावतः चंचल है और इंद्रियाँ स्वभावतः आकर्षण की ओर दौड़ती हैं। इसलिए उसने कहा - इंद्रियों को मारो मत, उन्हें साधो; इच्छा को दबाओ मत, उसे दिशा दो; काम को त्यागो मत, उसे धर्म के अधीन रखो। काम के धर्म के अधीन होना ही संतुलन है। जब काम धर्म पर शासन करने लगता है, पतन आरंभ होता है।
यह पतन अचानक नहीं आता। वह किसी एक बड़े अपराध से नहीं शुरू होता। वह धीरे-धीरे, दृष्टि से शुरू होकर मन तक फैलता है। मनुष्य जिस पर बार-बार दृष्टि डालता है, वही भीतर संरचना बनाता है।
इसलिए कहा गया: दृष्टि की रक्षा करो, क्योंकि पतन का द्वार आँखों से खुलता है।
ब्रह्मचर्य: देह का नहीं, चेतना का अनुशासन
हमारे समय में ब्रह्मचर्य को अक्सर गलत समझा जाता है। इसे केवल देहिक संयम या यौन-निषेध के रूप में देखा जाता है। परंतु शास्त्रों में इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक है - ब्रह्म में स्थित होकर चलना, अर्थात् जीवन को उच्चतम सत्य की दिशा में मोड़ देना। यह केवल शरीर का अनुशासन नहीं है; यह चेतना का अनुशासन है।
ब्रह्मचर्य शक्ति है। पर यह शक्ति दमन से नहीं आती; यह ऊर्जा के संरक्षण से आती है। जब मनुष्य अपनी जीवन-शक्ति को व्यर्थ के भोगों में बिखेरता नहीं, तब वही ऊर्जा ओज बनती है। ओज से तेज उत्पन्न होता है, और तेज से ज्ञान। यह केवल काव्यात्मक क्रम नहीं है; यह अनुभव का क्रम है। केंद्रित ऊर्जा स्पष्ट दृष्टि देती है। बिखरी हुई ऊर्जा भ्रम पैदा करती है।
इसलिए ब्रह्मचर्य “क्या नहीं करना है” की सूची नहीं है। यह “मैं किस दिशा में जी रहा हूँ” का प्रश्न है। यह जीवन को एक उच्चतर ध्येय की ओर मोड़ने की कला है।
अनुशासन: वासना का प्रतिरोध नहीं, उसका रूपांतरण
वासना का मूल स्रोत मन है। मन का मूल स्रोत इंद्रियाँ हैं। और इंद्रियों का मूल स्रोत आदतें हैं। यदि आदतें असावधान हैं, तो मन अस्थिर होगा। यदि मन अस्थिर है, तो इच्छा दिशाहीन होगी। इसलिए परंपरा ने आदतों पर काम किया—जीवन को अनुशासन में ढालने की बात की।
ब्रह्ममुहूर्त में उठना केवल धार्मिक आग्रह नहीं है; यह दिन की दिशा निर्धारित करने का उपाय है। रात्रि का आलस्य वासना को पोषित करता है, क्योंकि असावधान मन अधिक प्रतिक्रियाशील होता है। प्रातः का अनुशासन चेतना को जाग्रत करता है।
नित्य जप या स्मरण मन को केंद्र देता है। यह अवचेतन की दिशा तय करता है।
तप और परिश्रम शरीर को स्थिर बनाते हैं। एक आलसी शरीर प्रायः स्थिर मन नहीं दे सकता।
ये सभी अभ्यास वासना को दबाते नहीं; वे उसे ऊर्जा में रूपांतरित करते हैं। मनुष्य का मन कभी रिक्त नहीं रहता। या तो वह वासना से भरा होगा, या साधना से। प्रश्न यह नहीं कि ऊर्जा होगी या नहीं; प्रश्न यह है कि वह किस रूप में प्रकट होगी।
स्त्री: शक्ति का रूप, वस्तु नहीं
भारतीय परंपरा में स्त्री को शक्ति कहा गया—दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती। यह केवल प्रतीकात्मक सम्मान नहीं है; यह दृष्टि का प्रशिक्षण है। जब किसी मनुष्य को केवल भोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है, तो देखने वाले की चेतना संकुचित होती है। जब उसी मनुष्य को शक्ति, चेतना और गरिमा के साथ देखा जाता है, तो दृष्टि विस्तृत होती है।
यह विषय केवल स्त्री या पुरुष तक सीमित नहीं है। वस्तुकरण किसी भी दिशा में चेतना को नीचे ले जाता है। सम्मान सामाजिक औपचारिकता नहीं है; यह आध्यात्मिक परिपक्वता का संकेत है।
जीवन का उद्देश्य: सुख नहीं, सत्य
मनुष्य सुख भोगने के लिए नहीं जन्मा। सुख आवश्यक हो सकता है, पर वह पर्याप्त नहीं है। सुख क्षणिक है—आता है, जाता है, और पीछे एक रिक्तता छोड़ सकता है। सत्य स्थायी है। सत्य मनुष्य को भीतर से पूर्ण करता है।
वासना पर विजय नैतिक प्रदर्शन नहीं है; यह तेज की वृद्धि है। संयम सामाजिक नियम का पालन मात्र नहीं है; यह आत्म-राजत्व है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों पर शासन करता है, तब वह स्वयं का राजा बन जाता है। जब इंद्रियाँ मनुष्य पर शासन करती हैं, तब वह स्वयं का दास बन जाता है।
हम सबके भीतर एक अग्नि है: इच्छा की अग्नि, सृजन की अग्नि, जीवन की अग्नि। यदि वह अनियंत्रित हो जाए, तो वह जलाती है। यदि वह संरक्षित और निर्देशित हो, तो वही प्रकाश देती है।
अग्नि को सुरक्षित रखना: यही साधना है!
यही पुरुषार्थ है!
और यही मोक्ष का मार्ग है!


